कैमूर जिले में निलंबित शिक्षकों के जीवन-निर्वाह भत्ते पर विधान परिषद में गूंज

कैमूर जिले में निलंबित शिक्षकों के जीवन-निर्वाह भत्ते पर विधान परिषद में गूंज

= एमएलसी जीवन कुमार का सरकार से सीधा सवाल, क्याें नियमों की खुलेआम हो रही अवहेलना ? नियमों की अनदेखी पर सरकार से शिक्षकों की आजीविका पर संकट का सवाल भभुआ नगर. बिहार विधान परिषद में कैमूर जिले के शिक्षा विभाग से जुड़ा एक गंभीर और संवेदनशील मामला गूंज उठा. गया स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित एमएलसी जीवन कुमार ने सदन में प्रश्न उठाते हुए आरोप लगाया कि कैमूर जिले में निलंबित शिक्षकों को न तो समय पर जीवन-निर्वाह (गुजारा) भत्ता दिया जा रहा है और न ही निलंबन अवधि की जांच तय समय-सीमा में पूरी की जा रही है. उन्होंने इसे नियमों की अवहेलना बताते हुए सरकार से स्पष्ट जवाब व त्वरित कार्रवाई की मांग की. एमएलसी जीवन कुमार ने सदन में कहा कि बिहार सेवक नियमावली और शिक्षक नियमावली में निलंबन अवधि के दौरान शिक्षक को जीवन-निर्वाह भत्ता देना अनिवार्य है, ताकि वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके. इसके बावजूद कैमूर जिले के प्राथमिक, मध्य और उच्च विद्यालयों में कार्यरत कई निलंबित शिक्षकों को यह भत्ता महीनों तक नहीं दिया गया. उन्होंने सवाल किया कि क्या यह प्रशासनिक उदासीनता नहीं है, या जानबूझकर की गयी प्रताड़ना है? = पूर्व प्रधानाध्यापक का पत्र बना मुद्दे की जड़ मामला तब और गंभीर हो गया, जब राजकीयकृत मध्य विद्यालय बघिनी मोहनिया के पूर्व प्रधानाध्यापक काशी प्रसाद का पत्र सामने आया. पत्र में उन्होंने लिखा है कि निलंबन के दौरान उन्हें जीवन-निर्वाह भत्ता नहीं मिला, जबकि इसके लिए वर्तमान और पूर्व जिला शिक्षा पदाधिकारी, वर्तमान व पूर्व जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना) सहित कई अधिकारियों को लिखित व व्यक्तिगत रूप से अवगत कराया गया था. भत्ता न मिलने से वे आर्थिक और मानसिक दबाव का सामना कर रहे हैं, यह भी उल्लेख पत्र में किया गया है. जिम्मेदारी किसकी, वर्तमान या पूर्व अधिकारी ? एमएलसी ने यह भी कहा कि जांच की जिम्मेदारी किसी एक अधिकारी तक सीमित नहीं है. वर्तमान अधिकारियों से लेकर पूर्व जिला शिक्षा पदाधिकारी और स्थापना शाखा के पदाधिकारियों तक की भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. उन्होंने सवाल से दो टूक सवाल उठाया कि यदि नियम स्पष्ट हैं, तो भुगतान में देरी क्यों? और देरी हो रही तो इसके लिए जवाबदेह कौन हैं? सदन में पूछे गये प्रश्नों में यह भी शामिल रहा कि क्या निलंबन अवधि में जीवन-निर्वाह भत्ता देना अनिवार्य है? क्या कैमूर में यह भत्ता जानबूझकर रोका गया है? यदि हां, तो क्या सरकार तत्काल भुगतान करायेगी और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करेगी और यह कब तक हो सकेगा? गौरतलब है कि यह मामला सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि शिक्षकों के सम्मान और सीधा उनके परिवारों की आजीविका से भी जुड़ा है. अब निगाहें सरकार के जवाब और कार्रवाई की समय-सीमा पर टिकी हैं, यदि त्वरित कदम नहीं उठे, तो यह मुद्दा आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है. वहीं, कई शिक्षक संघ ने भी इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है.

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