शोभन एकमी बाईपास पर सवालों की बौछार

सीधा चौड़ीकरण छोड़ अलाइनमेंट क्यों बदला गया?
- पूर्व नक्शा और SIA रिपोर्ट को क्यों नजरअंदाज किया गया?
- क्या कुछ खास इमारतों को बचाने के लिए किसानों की जमीन ली जा रही है?
- यातायात और जलजमाव के खतरे की जिम्मेदारी कौन लेगा?
RxTv BHARAT, ब्यूरो दरभंगा —
दरभंगा जिले के शोभन एकमी बाईपास सड़क चौड़ीकरण को लेकर अब प्रशासन की भूमिका पर सीधे सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि जब पहले से तय था कि मौजूदा बाईपास सड़क को ही सीधा रखते हुए चौड़ीकरण और मजबूतीकरण किया जाएगा, तो फिर अचानक सड़क का अलाइनमेंट बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्ष 2012 में जो मूल नक्शा पास हुआ था, जिसमें सीधा चौड़ीकरण दर्शाया गया था, उसे अब क्यों बदला जा रहा है। ग्रामीण पूछ रहे हैं कि क्या उस नक्शे की वैधानिकता खत्म हो गई है, या फिर किसी खास को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों को दरकिनार किया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि बिहार सरकार द्वारा भेजी गई सोशल इंपैक्ट असेसमेंट टीम ने भी सर्वे के दौरान स्पष्ट निर्देश दिया था कि केवल मौजूदा बाईपास सड़क का ही चौड़ीकरण किया जाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि प्रशासन SIA टीम की रिपोर्ट को क्यों अनदेखा कर रहा है?
किसानों का कहना है कि वे सड़क किनारे से जमीन देने को तैयार हैं। 10 फीट, 15 फीट या जरूरत पड़े तो इससे ज्यादा जमीन देने में भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। फिर प्रशासन खेतों और आबादी के बीच से सड़क निकालने पर क्यों अड़ा है? क्या गरीब किसानों के घर और उपजाऊ जमीन की कोई कीमत नहीं है?
एक और अहम सवाल यातायात व्यवस्था को लेकर है। यदि सड़क की दिशा बदली गई तो वाहनों को कंसी चौक होकर घूमकर जाना पड़ेगा। दो चौक बहुत कम दूरी पर बनेंगे, जिससे दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ेगी। सोलस गेट बंद होने से एनएच-27 के दोनों ओर जलजमाव होगा, जिससे खेती प्रभावित होगी। इन संभावित खतरों की जिम्मेदारी कौन लेगा?
ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि कुछ अवैध या प्रभावशाली इमारतों को बचाने के लिए आम किसानों के हितों की बलि दी जा रही है। सवाल यह भी है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है, या फिर कमजोरों पर ही विकास का बोझ डाला जाएगा?
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से जवाब मांगा है और साथ ही राज्य सरकार से हस्तक्षेप की अपील की है। उनका कहना है कि यदि इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं मिला और जमीन-अधिग्रहण की प्रक्रिया पर पुनर्विचार नहीं हुआ, तो वे आंदोलन के रास्ते पर जाने को मजबूर होंगे।
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