सरकारी WhatsApp नंबर पर ‘ब्लॉक संस्कृति’ पर सवाल
जनसंपर्क के डिजिटल माध्यम में संवाद की जगह क्यों बन रही दूरी?
RxTv BHARAT | संपादकीय
डिजिटल युग में शासन-प्रशासन का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। आम जनता तक त्वरित संवाद स्थापित करने के लिए WhatsApp जैसे माध्यमों का उपयोग बढ़ा है, जिससे पारदर्शिता और पहुंच दोनों में सुधार की उम्मीद की जाती है।
👉 जनसंपर्क तंत्र की प्रभावशीलता पर उठते सवाल
👉 पारदर्शिता और जवाबदेही पर चर्चा
👉 संतुलित और जिम्मेदार उपयोग की आवश्यकता
हाल के समय में ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि कुछ सरकारी व्हाट्सएप्प नंबरों से नागरिकों, जनप्रतिनिधियों या पत्रकारों के साथ संवाद सीमित हो रहा है। कई मामलों में यह भी कहा जा रहा है कि लगातार फॉलो-अप या शिकायत करने पर संपर्क बाधित कर दिया जाता है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि हर मामले में नहीं है, लेकिन यह विषय सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनता जा रहा है।
सूचना का अधिकार केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रशासन और जनता के बीच विश्वास का माध्यम है। इसी भावना के अनुरूप सरकारी संचार व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है।
साथ ही यह भी आवश्यक है कि संचार के इन माध्यमों का उपयोग अनुशासन और मर्यादा के साथ हो। अभद्र भाषा, भ्रामक जानकारी या अनावश्यक दबाव जैसी स्थितियों में सीमित नियंत्रणात्मक कदम उचित माने जा सकते हैं।
परंतु जनहित से जुड़े मामलों में संवाद की निरंतरता बनाए रखना प्रशासनिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संवाद में कमी या बाधा से जनता और प्रशासन के बीच दूरी बढ़ने की आशंका रहती है, जो दीर्घकाल में विश्वास को प्रभावित कर सकती है।
ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के उपयोग को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश हों, जिससे पारदर्शिता और अनुशासन दोनों का संतुलन बना रहे।
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अंततः लोकतंत्र में संवाद ही सबसे मजबूत आधार है। डिजिटल माध्यमों का उद्देश्य इस संवाद को आसान बनाना है, न कि सीमित करना। इसलिए जरूरी है कि “ब्लॉक” नहीं, बल्कि संतुलित और जिम्मेदार “संवाद” को प्राथमिकता दी जाए।


